गौरवान्वित हिमाचल,पदमश्री से नवाजी जाएंगी चम्बा की ललिता वकील
* गौरवान्वित हिमाचल .... पदमश्री से
नवाजी जाएंगी चम्बा की ललिता वकील
* अत्यंत प्राचीन अद्भुत कशीदाकारी "चम्बा रूमाल"
का है अपना वैभवशाली इतिहास ।
* 16वीं शताब्दी में गुरु नानक देव जी की बहन बेबे
नानकी जी ने यह चम्बा कढाई का रूमाल किया
था गुरु नानक जी को भेंट ।
विश्व मानचित्र पर जिला चम्बा का नाम प्रचारित व प्रसारित करके ख्याति अर्जित करने वाले "चम्बा रूमाल" का अपना भी वैभवशाली इतिहास है।
चम्बा रुमाल की अद्भुत कशीदाकारी अत्यंत प्राचीन है ।
16 वीं शताब्दी से पूर्व की ये चम्बा कढाई की कला चम्बा ही नहीं अपितु आसपास की रियासतों में भी खूब प्रचलित थी। पहाड़ी शुक्षम चित्रकला की भांति इसके उदभ्व , व विकास की अनूठी गाथा है।।
17 वीं सदी में राजा पृथ्वी सिंह ने महिलाओं के लिए शिक्षा के स्थान पर चम्बा रुमाल की कला को सीखना जरूरी बना दिया।
जिसके चलते इस कला का बेहतरीन विकास हुआ।
18 वीं शताब्दी में राजा उमेद सिंह ने इस कला अर्थात कारीगरों को संरक्षण देकर कला विस्तार में अहम भूमिका निभाई ।
चम्बा रुमाल का लन्दन के विक्टोरिया अल्बर्ट म्यूजियम में रखा जाना भी स्वयं रुमाल व इसके वैवभशाली इतिहास के दर्शन करवाता है।
वर्ष 1911 में राजा भूरी सिंह ने भी चम्बा कढ़ाई के रूमाल की कला को बहुत प्रोत्साहन दिया ।
इस कला के शिल्पियों को वर्तमान में भी सरकार द्वारा न केवल संरक्षण देखकर प्रोत्साहित ही किया जा रहा है
अपितु उनकी उनकी कला निपुणता का मूल्यांकन करके उन्हें राष्ट्रीय स्तर तक पुरस्कृत किया जा रहा है इसी कड़ी में
इस विश्व प्रसिद्ध चम्बा रुमाल को नई बुलंदियों पर पहुंचाने के लिए जिला चम्बा की ललिता वकील का चयन पदमश्री पुरस्कार के लिए हुआ है।
इन दोनों महिला शिल्पियों ने अपनी कलाकृतियों को न केवल अत्यंत निपुणता से उकेरा ही है अपितु प्राचीन चम्बा रुमाल के वैभव को भी दर्शाया है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर इस कला को ख्याति दिलाने में योगदान दिया है।
तीन राष्ट्रीय अवार्ड, शिल्पगुरु, नारी शक्ति आदि पुरस्कार हासिल करने वाली ललिता वकील को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जाना हिमाचल प्रदेश विशेषतया चम्बा के लिए अत्यंत गौरव का विषय है।
इस संदर्भ में ललिता वकील का कहना है कि चम्बा रुमाल को जीवित रखने की परंपरा को आगे बढ़ाने का जो सौभाग्य मुझे मिला है उसके लिए मैं अपने आप को भग्यशाली मानती हूं।
उनका कथन है कि चम्बयाली कढाई की कारीगरी से गरीब परिवारों की लड़कियों को अपने पांव पर खड़ा करना ही अब उनका लक्ष्य है।
उन्होंने कहा कि चम्बा रुमाल का संवर्धन प्रचार प्रसार व ख्याति दिलाना ही उनका मुख्य लक्ष्य है।
होशियारपुर के गुरूद्वारे में संरक्षित किया गया चम्बा कढाई का रुमाल सबसे प्राचीन कृति के रूप में माना जाता है।
लोगों की मान्यता है कि 16वीं शताब्दी में गुरु नानक देव जी की बहन बेबे नानकी जी ने यह चम्बा कढाई का रूमाल गुरु नानक जी को भेंट किया था।
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