कैलाश पर्वत के दर्शन और “मनीमहेश झील” में स्नान करके लाखों लाख श्रद्धालु जीवन को बनाते हैं धन्य
- मणिमहेश झील स्नान, परिक्रमा पश्चात की गई पूजा अर्चना मनुष्य जीवन की मानी जाती है सबसे सार्थक, उत्कृष्ट और पवित्र पूजा-अर्चना।
- समुंदर तल से लगभग 13,270 फीट की ऊंचाई पर लगभग डेढ़ किलोमीटर की परिधि में फैली पवित्र मणिमहेश झील
- अनेकों प्राचीन धार्मिक मान्यताओं ,गाथाओं और अपार श्रद्धा और आस्था से परिपूर्ण है मणिमहेश यात्रा
देवी देवताओं की भूमि,, ऋषि मुनियों की तपोस्थली हिमाचल प्रदेश सदियों से “देव भूमि ” के नाम से जाना जाता रहा है। यहां पग पग पर देवी-देवताओं के असंख्य मंदिर और देवालय न केवल यहां के लोगों की धार्मिक आस्था और श्रद्धा का विराट स्वरूप ही प्रकट करते हैं, अपितु बारह माह यहां आयोजित किए जाने वाले धार्मिक मेले ,पर्व ,त्योहार और पवित्र यात्राएं यहां की धार्मिक मान्यताओं परंपराओं को पुनर्जीवित करके आमजन की धार्मिक भावनाओं और पौराणिक गाथाओं को भी सजीवता प्रदान करती हैं ।
” शिव भूमि ” के नाम से जगत विख्यात जिला चम्बा अनेकों प्राचीन धार्मिक
परंपराओं,मान्यताओं को मौलिक स्वरूप में समेट कर वर्तमान में भी लोगों की
धार्मिक आस्था का मुख्य केंद्र बना हुआ है ।
जिसका सशक्त प्रमाण जन्माष्टमी से राधाष्टमी तक चलने वाली ” पवित्र मणिमहेश कैलाश यात्रा ” के दौरान देखने को मिलता है ।
18,564 फुट ऊंचे कैलाश पर्वत के आंचल में 13,500 फुट की ऊंचाई पर स्थित ” मणिमहेश कैलाश तीर्थ स्थल ” पर हर वर्ष भादो माह को न केवल चम्बा या प्रदेश के अन्य स्थानों से श्रद्धालु दुर्गम कठिन मार्ग को तय करके यहां पहुंचते हैं ,अपितु जम्मू , पंजाब ,हरियाणा के अलावा अन्य राज्यों व विदेश से भी लाखों लाख श्रद्धालु सैकड़ों हजारों किलोमीटर की लंबी यात्रा करके इस पवित्र झील में डुबकी लगाकर अपनी धार्मिक यात्रा पूर्ण करते हैं।
आस्था की इस विराट स्थली में जुटने वाले लाखों श्रद्धालु अदभुत प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण मणिमहेश कैलाश यात्रा में अनेकों कठिनाइयों को सहते हुए अपनी धार्मिक आस्था व मान्यता को न केवल पुख्ता बनाते हैं ,अपितु कैलाश पर्वत के दर्शन कर के उसके आंचल में स्थित पवित्र झील में स्नान करके अपने जीवन को भी धन्य बनाते हैं।
चम्बा मुख्यालय से मात्र 65 किलोमीटर दूरी पर 2,195 मीटर की ऊंचाई पर स्थित उप मंडल भरमौर के मणिमहेश में आयोजित की जाने वाली पवित्र मणिमहेश कैलाश यात्रा का शंखनाद जन्माष्टमी से पूर्व ही हो जाता है। हजारों की संख्या में भद्रवाही श्रद्धालु चार सौ से भी अधिक किलोमीटर की लंबी यात्रा पैदल चल कर मणिमहेश की डल झील में जन्माष्टमी पर्व पर पवित्र स्नान करते हैं।
चम्बा मुख्यालय में स्थित, दशनामी अखाड़े की पवित्र छड़ी व सिद्ध बाबा श्री चरपट नाथ की छड़ी यात्रा राधाष्टमी से आठ दिन पूर्व मणिमहेश के लिए विधिवत रुप से आरम्भ होती है।
लक्ष्मी नारायण मंदिर में भगवान शिव की चांदी की छड़ी के पूजन के पश्चात यह छड़ी यात्रा साधु संतो, महात्माओं,गणमान्यों लोगों, प्रशासनिक अधिकारियों के साथ शोभायात्रा का स्वरूप धारण कर लेती है। तपश्चात यह छड़ी यात्रा मंदिर से जुलाहकड़ी ,राख ,दुर्गेठी इत्यादि अलग अलग पड़ावों से गुजरते हुए चौथे दिन भरमौर पहुंचती है।
यहां छड़ी के पूजन के बाद , एक दिन के विश्राम पश्चात भरमौर चौरासी प्रांगण में स्थित मंदिरों व आसपास के क्षेत्रों के की छड़ियों व चेलों के साथ भरमौर से 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हडसर, धनछोह इत्यादि स्थलों से होती हुई यह यात्रा आठवें दिन मणिमहेश पहुंचती है ।
यहां समुंदर तल से लगभग 13,270 फीट की ऊंचाई पर लगभग डेढ़ किलोमीटर की परिधि में फैली पवित्र मणिमहेश झील ” विद्यमान है। सामने पूर्व की ओर कैलाश पर्वत की चोटी है। इस पर्वत पर एक नुकीली चोटी और शिवलिंग जैसे आकार की शिला है। जिसके संदर्भ में लोगों की शिवलिंग के रूप में मान्यता है। श्रद्धालुओं का कथन है कि चोटी पर निरंतर एक “मणि” चमकती रहती है । पवित्र स्नान वाले दिन या विशेष मुहूर्त में श्रद्धालुओं को इसके दुर्लभ दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।
कृष्णाष्टमी वाले स्नान को ” जोग नहोण ” कहा जाता है, जिसमें मुख्यता, योगी, महात्मा, साधु संत व जम्मू के भद्रवाह क्षेत्र से आने वाले हजारों की संख्या में श्रद्धालु स्नान करते हैं। जबकि राधााष्टमी के स्नान को ” बड़ा नहोण ” कहा जाता है । इसमें सभी श्रेणियों के श्रद्धालु पवित्र स्नान करते हैं।
यू प्रतीत होता है मानो झील में उफान आ गया हो, तब पानी के बुलबुलों के साथ-साथ लकड़ी के महीन 2 तिनके झील की सतह पर तैरने लगते हैं।
यहां स्नान के पूर्व का दृश्य अत्यंत अलौकिक होता है। सैकड़ों की संख्या में ” चेले ” अपने डमरु ,ढोल, सॉन्गल तथा पौण , की मधुर ध्वनियों के संग धूडू स्वामी अर्थात शिव भगवान के गगनचुंबी जयघोषों से संपूर्ण मणिमहेश को भक्तिमय बना कर गुंजायमान कर देते हैं।
केलंग के चेले ” अर्थात गुर, के आदेश पर सबसे पहले देवताओं के चेले , पवित्र झील में कूदते हैं । जिसे स्थानीय बोली में ” डल तोड़ना ” यानी झील काटना कहा जाता है ।
इसके पश्चात अन्य श्रद्धालु इस पवित्र झील में स्नान करते हैं ।श्रद्धालुओं की अटूट व अपार आस्था का साक्षात रूप का प्रतिफल तब देखने को मिलता है। जब ” पर्व ” वाली भोर में एकाएक पवित्र झील का जल सामान्य स्तर से ऊपर चढ़ जाता है ।
इस 15 दिनों तक चलने वाली इस पवित्र मणिमहेश यात्रा का पहला स्नान भरमौर मुख्यालय से मात्र 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ” माता भरमाणी ” के जल कुंड में स्नान से आरंभ होता है। माता भरमाणी के जल कुंड में स्नान करना अनिवार्य माना जाता है। इस के संदर्भ में भी अनेकों धार्मिक मान्यताएं व गाथएं प्रचलित है।
सिद्ध योगी चरपट नाथ सहित 84 सिद्धों व नौ नाथों द्वारा भरमौर मुख्यालय में रमाई गई धूनियों के फलस्वरूप ” चौरासी मंदिर ” समूह से विख्यात , चौरासी परिसर में महिषासुर मर्दिनी अर्थात लखना माता, मणिमहेश मंदिर, गणेश, कार्तिक्ये इत्यादि के अनेकों मंदिरों के दर्शन, पूजा अर्चना के पश्चात आगे की 13 किलोमीटर की यात्रा पैदल या वाहन द्वारा तय किए जाने के बाद हडसर नामक स्थान पर पहुंचा जाता है। समुंदर तल से 7 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित यहां शिव का बहुत प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं को आगे के पैदल सफर के लिए जिज्ञासा व ऊर्जा प्रदान करता है।
नौ किलो मीटर का ऊंची ,नीची सरपीली पगडंडियों का कठिन कच्चे दुर्गम रास्ते का सफर तय करने के पश्चात ” धनछोह ” पहुंचते ही श्रद्धालु अपनी तमाम थकान को भूलकर प्रकृति के सुहावनें सम्मोहन में इस कदर खो जाते हैं , मानों वह धरती नहीं स्वर्ग लोक की विराट संपदा का अवलोकन कर रहे हों।
समुंदर तल से 8,003 फुट की ऊंचाई पर स्थित, यहां एक ऊंचा जलप्रपात अर्थात झरना अपनी शीतल बूंदों से श्रद्धालुओं के रोम-रोम को गद गद करके अपनी प्राचीनता और धार्मिक महत्व का बोध भी करवाता है ।
मान्यता है कि शिव से वर प्राप्त करने के पश्चात भस्मासुर, शिव भगवान को भस्म करने उनके पीछे दौड़ा, तो शिव ने इसी विशाल जलप्रपात के पीछे एक विराट गुफा में छिप कर अपनी जान बचाई थी। यहां समीप में सिद्ध चरपट नाथ की गुफा भी है।
बंदर घाटी ,भैरों घाटी ,गौरीकुंड शिवकरोत्रि के मनोरम दृश्य और विकट सफर के पश्चात शिव भगत पवित्र ” कैलाश पर्वत ” के दर्शन करते हैं तो अपने जीवन की सार्थकता पा लेने के बोध से भाव व्हील हो जाते हैं ।
पवित्र मणिमहेश झील में स्नान के अतिरिक्त मां गौरी के स्नान स्थल ” गौरी कुंड ” में भी महिलाओं द्वारा स्नान किया जाता है। जबकि मणिमहेश झील के समीप दाएं छोर पर स्थित शिवकरोत्रि में पुरुषों के स्नान करने की धार्मिक मान्यता है।
बर्फीली चोटियों से घिरी नीले रंग के पानी की पवित्र मणिमहेश झील यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की आस्था का न केवल विराट दर्शन ही प्रतिबिंबित करती है , अपितु उनकी मनोकामना और लक्ष्यों को पूर्ण करने में ऊर्जा का भाव भी झलकाती है।
झील के एक छोर पर भगवान शिव का छत रहित छोटा मंदिर है। जहां असंख्य श्रद्धालु, अपनी पूजा अर्चना ,श्रद्धा तथा आस्था को प्रकट करते हैं । मंदिर के पीछे की ओर एक ” कालिका कुंड है ‘ जिसका अपना विशेष धार्मिक महत्व है।
इस झील की परिक्रमा और यहां की गई पूजा अर्चना मनुष्य जीवन की सबसे सार्थक, उत्कृष्ट और पवित्र पूजा-अर्चना मानी जाती है ।
लोगों की मान्यता है कि इस मणिमहेश झील में स्नान करने के पश्चात जन्म जन्म के पाप रोगों से भी छुटकारा प्राप्त होता है। अनेकों धार्मिक महत्व मान्यताएं, परम्पराऎं हर वर्ष लाखों लाख श्रद्धालुओं को पवित्र मणिमहेश यात्रा के लिए मौण निमंत्रण देते हैं।
कुछ अन्य विशेषताएं।
समुंदर तल से 18,654 फुट की ऊंचाई पर स्थित मणिमहेश कैलाश पर्वत की एक विशेषता यह भी है कि कोई भी प्राणी अब तक तक इस शिखर पर नहीं पहुंच पाया है। कई लोगों ने इस पर चढ़ने का प्रयास किया लेकिन सभी असफल रहे। एक गडरिया बहुत पहले इस चोटी पर अपनी भेड़़ बकरियों के साथ चढ़ने के प्रयास में मार्ग के मध्य में शिला बन गया जिसके प्रतीक चिन्ह चट्टानों के रूप में दिखाई देते हैं।
एक अनुमान के अनुसार इस पवित्र यात्रा में 30 प्रतिशत से भी अधिक जम्मू क्षेत्र के भद्रवाही श्रद्धालु स्नान करने के लिए आते हैं ।
भरमौर में विश्व का एकमात्र “धर्मेश्वर महाराज” का मन्दिर यह शोभायमान है।
भरमौर स्थित चौरासी मंदिर प्रांगण में यात्रा के दौरान आठ जात्रों और सात जगरातो का आयोजन किया जाता है जहां हजारों की संख्या में गद्दी गद्दिने अपनी परंपरागत वेशभूषा में शिव की महिमा का गान करते हुए नृत्य करते हैं, जो घंटों तक चला रहता है ।
भरमौर चौरासी परिसर में स्थित, चौरासी मन्दिरों का समूह , विश्व का एकमात्र विराट मंदिर समूह है।











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