त्याग, समर्पण और बलिदान की अनूठी मिसाल – सूही माता
रानी सुनयना यानी “सुही माता ” ने लगभग एक हजार वर्ष पूर्व अपनी प्रजा के हित के लिए न केवल अपने प्राणों की आहुति ही दी अपितु समस्त मानव जाति को त्याग, समर्पण ,और बलिदान का एक अविस्मरणीय आदर्श स्थापित करके यह संदेश भी संप्रेषित किया कि, जो मानव, जनहित के कल्याण लिए अपना जीवन अर्पित करता है। वह मरता नहीं ,अपितु अमर हो जाता है। रानी सुनयना की अमर बलिदान गाथा की शुरुआत ‘ दसवीं शताब्दी “से आरंभ होती है। जब “राजा साहिल वर्मन” ने अपनी राजधानी भरमौर से चम्बा स्थानांतरित की थी। तब राजधानी में लोगों के लिए अपार सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद ,राज परिवार और प्रजा के बीच अत्यंत दुख और चिंता के भाव थे । जिसका कारण था चम्बा में पेयजल का अभाव। नगर में पेयजल की कमी को दूर करने के लिए राजा ने ” सरोथा खड्ड ” से नहर खुदवाई लेकिन जल का प्रवाह मूल स्थल पर ही रुक गया। अनेकों प्रयासों के बावजूद हमेशा असफलता ही हाथ लगती। जिस चलते राजा की चिंताओं में बढ़ोतरी होती गई।
यद्यपि राजा, प्रजा को जल उपलब्ध करवाने के लिए नित्त नए उपायों की खोज में लगे रहते, लेकिन कहीं से भी कोई आशा की किरण मिलती नजर नहीं आती। तब एक रात्रि राजा को स्वपन में उनकी ” कुल देवी” ने प्रकट होकर बतलाया कि राज परिवार से अगर राजा स्वयं या फिर महारानी अथवा राजकुमार अपने को जिंदा चिनवा कर बलिदान दे, तो अनिष्ट शक्तियां संतुष्ट होकर जल का प्रवाह छोड़ देंगी , और नगर तक सहजता से जल पहुंच जाएगा । यही स्वपन रानी सुनयना को भी हुआ ।राजा और रानी की नींद खुल गई तो दोनों अपने-2 कक्षों में इस नई चिंता को लेकर विचार मगन हो गए। भोर की पहली आहट से जब उनकी तंद्रा टूटी तो राजा और महारानी के मध्य स्वपन के संदर्भ में विस्तार पूर्वक चर्चा हुई । अनेकों तर्कों के पश्चात जहां राजा ने कुल देवी के स्वप्न में प्रकट होने और अपने को जिंदा चिनवा लेने को महा वरदान मानते हुए नश्वर शरीर को प्रजा हित में समर्पित करना अपने लिए श्रेष्ठ पुण्य माना , वहीं महारानी ने देवी के स्वपन को अपने लिए आदेश मानते हुए ” मलूण ” नामक स्थान पर खुद को चिनवा कर अनिष्ट शक्तियों के दुष्प्रभाव को खत्म करके नगर में पेयजल को चलायमान करने की बात कहते हुए , राजा से हठ किया कि महारानी ही इसके लिए श्रेष्ठ विकल्प है। महारानी का यह भी तर्क था कि, राजा का जीवन प्रजा हित के लिए नितांत आवश्यक है ।राजा अगर अपना बलिदान देता है तो प्रजा का अहित भी संभव है ,क्योंकि राजा के देहावसान के पश्चात अन्य बाहरी राजा आक्रमण करके चम्बा को अपने अधीन कर सकते हैं । प्रजा के अनाथ होने की स्थिति में बाहरी राजाओं की यातनाओ का शिकार भी प्रजा को होना पड़ सकता है ।
अतः महारानी ने प्रजा के हित के लिए राजा को अपने बलिदान के निश्चय को त्यागने का अनुरोध किया । महारानी ने राजकुमार ” घुंघरू ” को भी बलिदान की आज्ञा ना देने का परामर्श देते हुए कहा , कि ऐसा करने से राज वंश ही समाप्त हो जाएगा । राजा के बार-2 अपना बलिदान देने के संकल्प को दोहराने के बावजूद महारानी ने उनको इसके लिए सहयोग देने में अपनी पूर्ण असमर्थता प्रकट करते हुए राजा से कहा कि ,राज परिवार व प्रजा हित में यही उचित है ,कि नगर में जल प्रवाह हेतु बलिदान देने के लिए मैं ही उपयुक्त पात्र हूं , और मैं इसके लिए सहर्ष तैयार भी हूं आप मुझे यह सर्वोत्तम अवसर प्रदान करें । महारानी के समस्त तर्को से निरुत्तर होकर अंतता राजा को स्वीकृति देनी ही पड़ी ।
निर्धारित दिन महारानी ने पारंपरिक राजसी वेशभूषा संग, हार – श्रृंगार करके विशेष रूप से सुसज्जित पालकी में प्रवेश किया तो भारी संख्या में वहां आई प्रजा की आंखों से बहती अश्रु धारा एकाएक रूदन के रूप में परिवर्तित हो गई । कहार भारी मन से छोटे-2 पग बढ़ाते हुए महारानी की अंतिम यात्रा को पूर्ण करने के लिए “मलूण ” की ओर इस भाव से चल रहे थे मानो प्रार्थना कर रहे हो कि वे कभी अपने गंतव्य तक पहुंचे ही नहीं ।
“शाहमदार” की पहाड़ी के मध्य पहुंचकर महारानी ने एकाएक पालकी को नीचे रखने का आदेश दिया। कहारों के पालकी को नीचे रखते ही समस्त लोग स्तब्ध होकर, अपने कान और आंखों को महारानी पर केंद्रित करके अगली घटना का अनुमान लगाने लगे । उन्हें लगा संभवत महारानी अपना निर्णय बदलकर वापिस राज महल की ओर चलने का आदेश देंगी । लेकिन लोगों की असमंजस के यह भाव अधिक समय तक नहीं रह सके । महारानी ने धीरे से पालकी का पर्दा हटाया और बाहर आकर अत्यंत स्नेह भाव से शाहमदार के आंचल में बसे चम्बा नगर को अंतिम बार निहारते हुए नगर वासियों से वापस लौट जाने का आग्रह करते हुए कहा, “प्रत्येक मनुष्य की मृत्यु निर्धारित है।इस नश्वर शरीर को एक दिन नष्ट होना ही है” महारानी ने फिर कहा “मुझे मेरी प्रजा के हित के लिए अपना जीवन अर्पित करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है” । उन्होंने प्रजा के भविष्य की मंगल कामना करते हुए एक बार फिर से चम्बा नगर और नगर वासियों की भीगी आंखों को निहारते हुए, मंद मंद मुस्कुराते हुए पालकी में बैठकर अपनी यात्रा को जारी किया ।अत्यंत हृदय विदारक पल थे वे, कुछ वृद्ध, महिलाएं व बच्चे मार्ग में ही रुक गए । शेष नगरवासी रोते बिलखते पालकी के पीछे विलाप करते हुए निरंतर आगे बढ़ते जा रहे थे । पालकी के भीतर बैठी महारानी पूर्ण शांत मुद्रा में बैठकर अपने बलिदान पश्चात प्रजा को मिलने वाले अमूल्य पेयजल की सुविधा से आनंदित होते उनके चेहरों की परिकल्पना से रोमांचित भावों से लबरेज दिख रही थी। “मलुण ” नामक स्थल पर पहुंचकर पालकी से निकलकर महारानी अपने चिने जाने वाले स्थान पर हाथ जोड़ , आंखें बंद करके भक्तिभाव से यूं खड़ी हो गई मानो कुलदेवी को अपना बलिदान स्वीकार करने का आह्वान कर रही हों। भारी मन से रोते-रोते राज मिस्त्रियों ने धीरे-2 ” पत्थर और गारे ” से उस बलिदानी महारानी का शरीर चिन दिया , जिसने न केवल त्याग, समर्पण ,बलिदान व प्रजा कल्याण की अमिट मिसाल को इस धरा पर स्थापित किया ,अपितु अमरत्व की नई व्याख्या को भी प्रस्फुटित किया। महारानी के इस बलिदान से अनिष्ट शक्तियां तृप्त हुई और अवरुद्ध जल का प्रवाह आरंभ होने लगा ।
महारानी सुयनना की पुण्य स्मृति में हर वर्ष 15 चैत्र से नगरवासियों में ” सूही मेला ” मनाने की परम्परा लंबी अवधि तक चलती रही। धीरे-2 अब यह अंतिम 3 दिनों तक ही सिमट कर रह गई है। बलिदान स्थल पर जाते हुए जिस स्थान पर महारानी ने रुककर नगर वासियों को अपना अंतिम संदेश दिया था । वहां परम्परानुसार अब भी पालकी में राज महल (राजा का बेहडा ) से देवी सुनयना की प्रतिमा को शोभायात्रा के साथ लाकर स्थापित किया जाता है। कृतज्ञ नगर वासियों का हजूम वहां पूजा अर्चना के लिए उमड़ पड़ता है । सूही मेले में नगर वासियों की व्यापक सहभागिता के अतिरिक्त आसपास क्षेत्र के लोग भी अत्यंत श्रद्धाभाव से इस मेले में भाग लेते हैं । चंबा से बाहर ब्याही बेटियों को भी इस मेले का अत्यंत शिद्दत के साथ इंतजार रहता है ।और वे पीहर से बुलावे का अत्यंत बेसब्री से इंतजार करती है। इन अनुभूतियों के प्रकटीकरण के लिए अनेकों घुरेहियों की भी रचना की गई है।
” सूही का मडा ” में हर वर्ष भरमौर की महिलाएं अपनी गाद्दी पारम्परिक वेशभूषा लुआंचडी , सुथनू , घुंडू स्थानीय आभूषण चौंक ,बालू , टिक्का , लोन्ग ,चंद्रहार ,झांझर , डोडमाला गोजरू इत्यादि से सुसज्जित होकर घंटों भरमौर के लोक गायन व नृत्य ” घुरेही ” से समूचे नगर वासियों के मानसपटल पर न केवल सूही माता की बलिदान की अनूठी घटना की स्मृतियां अंकित कर देती हैं।अपितु एक सेतु के रूप में प्राचीन परंपराओं को भावी पीढ़ी तक पहुंचाकर विलुप्त होती सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने की कोशिश भी करती हैं। इन स्वर लहरियों की गूंज से निर्मित होते करुणामय वातावरण को, समस्त चम्बा नगर निवासी अपनी धरोहर के रूप में सहेज कर हर वर्ष चैत्र माह का इंतजार करते हैं। वर्तमान में भी महिलाओं की विशेष लय में गाई जाने वाली घुरेहियों के गूंजते स्वरों से प्रत्येक हृदय द्रवित हो उठता है । लेकिन आधुनिक युग में भी कोई चमबयाल इन घुरेहियों को सुनने का लोभ नहीं छोड़ना चाहता। सुही माता की प्रतिमा की स्थापना के 3 दिन पश्चात वहां से श्रद्धा पूर्वक उस प्रतिमा को राजमहल वापिस लाया जाता है । इस मौके पर गाए जाने वाली घुरेेही सूही माता के बलिदान को पुनः याद करवा देती है।
सुकरात कुड़ियों चिडियो ,सुकरात देवी रे देहरे हो ।
ठंडा पानी किहां करी पिणा हो, तेरे नैना हेरी हेरी जीना हो।।
सुकरात कुड़ियों चिड़ियों ,सुकरात नोणा पनिहारे हो ।
ठंडा पानी किहां करी पिणा हो, तेरे नैना हेरी हेरी जीना हो ।।
सुकरात कुड़ियों चिड़ियों ,सुकरात राजे रे बेहडे हो।
ठंडा पानी किहां करी पिणा हो ,तेरे नैना हेरी हेरी जीना हो।।
रंग लाल कुड़आ तेरा हो ,रंग लाल चीडूआ तेरा हो ।
ठंडा पानी किया करी पिणा हो, तेरे नैना हेरी हेरी जीना हो।।





टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें