अनेकों विशेषताओं से परिपूर्ण है, चम्बा का एतिहासिक चौगान
- अनेकों विशेषताओं से परिपूर्ण है चम्बा का एतिहासिक चौगान ।
- राजा श्याम सिंह ने करवाया था चौगान का विस्तार व समतलीकरण ।
- बीसियों लोकगीतों और भजनों में है चौगान का उल्लेख ।
- विदेशों से मंगवाया था चौगान के लिए घास।
- चौगान के माध्य से बहती थी पहले रावी नदी।
- 84 परगणों से लाई गई थी चौगान के लिए मिट्टी ।
हिमालय के ऊत्तरी आंचल में बसा चम्बा अपनी धार्मिक, सामाजिक, ऐतिहासिक, व सांस्कृतिक परम्पराओं के कारण जगत विख्यात है । पग 2 पर यहां विभिन्न शैलियों से निर्मित असंख्य मंदिर और देवालय उत्कृष्टता की श्रेष्ठता से परिपूर्ण देवी-देवताओं की मूर्तियां, लोकगीत व गाथाएं , लोक कलाएं ,नृत्य ,गायन, धार्मिक मान्यताएं , ताम्रपत्र , शिलालेख,वास्तु कला और यहां का नयनाभिराम प्राकृतिक सौंदर्य हर वर्ष लाखों लाख श्रद्धालुओं और पर्यटकों को यहां आने का मौन निमंत्रण देता है।
चंबा की अपार विशेषताओं के उल्लेख में अगर चम्बा का दिल कहलाए जाने वाले चौगान की विशेषताओं का जिक्र न किया जाए तो चम्बा की बात अधूरी ही रह जाएगी । अपनी ऐतिहासिक व धार्मिक पृष्ठभूमि और सौंदर्य के कारण चम्बा के चौगान का अपना खास महत्व है ।
चंबा मुख्यालय के बीचो बीच लगभग एक किलोमीटर लंबा और 75 मीटर चौड़ा खुला समतल घास का मैदान अथवा चौगान पहाड़ी क्षेत्र में अपनी विशालता के लिए जहां अहम स्थान रखता है वहीं मानव संसाधनों द्वारा निर्मित यह चौगान आगंतुकों के लिए भी सदैव जिज्ञासा का केंद्र बना रहता है।
अनेकों धार्मिक , राजनीतिक , सामाजिक ,खेलों,त्योहारों , राष्ट्रीय पर्वों इत्यादि गतिविधियों की मुख्य आयोजन स्थली चम्बा चौगान के संदर्भ में बीसियों किंवदंतियों के अतिरिक्त ऐतिहासिक तथ्य यह है कि 1873 ईस्वी में राजा श्याम सिंह द्वारा राजगद्दी संभालने उपरांत अपनी रज्यावधि ( 18 73 / 1904 इस्वी) के दौरान अनेकों विकासात्मक कार्यों को अमलीजामा पहनाया गया । राजा श्याम सिंह की उपलब्धियों की फेहरिस्त में चम्बा चौगान का समतलीकरण करना भी शुमार है । चौगान को समतल करने इसका दायरा बढ़ाने के लिए देवदार के भीमकाय बड़े-2 शहतीरों को व्यवस्थित ढंग से बसाया गया और विभिन्न 84 परगणों की मिट्टी मंगवा कर यहां बिछाई गई ।यह सब कार्य कुशल कारीगरों की देखरेख में परगणों के नागरिकों द्वारा ” बगार ” अथवा राज सेवा के रूप में करवाया गया। । राजा ने चौगान के सौंदर्य को बढ़ाने के लिए चौगान के एक तरफ “हवा बंगलुओंं ” का निर्माण करवाया जहां से रावी नदी का नजारा लिया सकता था। चारों ओर इंग्लैंड से मंगवाकर नक्काशी युक्त बिजली के खंभे स्थापित किए गए । चौगान का श्रृंगार अथवा खूूबसूरती के लिए विदेशों (मलेशिया ,जर्मनी ,इंग्लैंड ) से द्रुव (घास) मंगवाई गई । इस घास की विशेषता यह थी कि इस पर लगातार लोगों की आवाजाही के बावजूद यह कुचले जाने उपरांत भी सहजता से पीली नहीं पड़ती थी ।घास एक समान उगती और वह मखमली गलीचे सा आभास देती थी। इसे सींचने के लिए चौगान के बीच में ही हाइडेंट भी स्थापित किए गए । वर्षों तक इस चौगान की देखरेख का कार्य राजा के कारावास में कैद बंदियों से करवाया जाता रहा ।आजादी से पूर्व यह चौगान अंग्रेज हुक्मरानों और चम्बा के राजाओं द्वारा सैरगाह और खेल के मैदान के रूप में भी प्रयोग में लाया जाता था ।आमजन भी मेलों इत्यादि के अवसर पर इस चौगान में ही एकत्रित होते रहे हैं। कालांतर इस विशाल चौगान को पांच भागों में विभक्त कर दिया गया।
चौगान के संदर्भ में किंवदंतियां
लोगों का कथन है कि आरंभ में इरावती नदी वर्तमान में रावी नदी नगर के बीचो बीच बहती थी।लोगों को नदी पार स्थित मंदिर में पूजा अर्चना के लिए जाने में कठिनाई होती थी । तब राजा के आग्रह पर एक महात्मा ने लगातार सात दिनों तक यज्ञ करके नदी के बहाव को दूसरे छोर की ओर मोड़ दिया । कुछ लोगों का मानना है कि नगर के मध्य से बहती नदी का रास्ता भगवान हरिराय ने बदला था।
चम्बा के भजनों व लोकगीतों में चौगान का महिमागान ।
चंबा के चौगान का वृतांत यहां के भजनों और लोकगीतों में अनायास ही झलक उठता है ।सुप्रसिद्ध शिव भजन में मणिमहेश यात्रा के लिए श्रद्धालुओं के भक्ति भाव में ” पहला ता डेरा चंबे रे चुगाना दूजा डेरा भरमौरा” के अतिरिक्त विश्व प्रसिद्ध प्रेमी जोड़ियों में शुमार “कुंजू चंचलो” की मिलन स्थली चम्बा के चौगान का पिपल का पेड़ निशानी के रूप में जहां लोक कलाकारों की सृजनता में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाता है ।वही “ए चौगान चंबे दा मेरा दिल गददिया ” ” चमबे रे चुगाना भेाैरां मिंजरा लगोरी हो ” जैसे बीसियों लोकगीत आनंदभाव की अनुभूतियां करवाते हैं ।वही चंबा के लोगों का चौगान के प्रति अथाह स्नेह भाव मृत्यु की कल्पना पर एकाएक चौगान के बिछोह की टीस को स्वर लहरियों में प्रस्फुटित करके यहां के लोगों की आंखों को नम कर के हृदय को भी द्रवित कर जाती हैं। “हो इक्क दिन छोड़ी देना चंबे दा चुगान छोड़ी देना हो, हो ईक्क दिन रेही जानी बारग नमानी रेही जानी हो”, जैसे लोकगीत वर्तमान में भी प्रचलित है ।
आठ दिन तक चलने वाले ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला का आयोजन भी इसी चौगान में किया जाता है
पूर्व में यातायात की व्यापक सुविधाएं न होने के दौर में भरमौर से जांधर (निचले क्षेत्रों )और जांधर से भरमौर की ओर जाते समय गद्दी लोग अपने धण (भेड़ बकरियों का समूह) के साथ चम्बा चौगान में ही रात्रि विश्राम करते थे। वर्तमान में मणिमहेश की पवित्र यात्रा के लिए प्रस्थान करने वाले चम्बा के ग्रामीण क्षेत्रों के लोग व बाहरी राज्यों के श्रद्धालु चम्बा चौगान में विश्राम करते हैं जहां इन श्रद्धालुओं के शिव भक्ति के जयघोषों से समूचा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। हर वर्ष जुलाई माह के अन्तिम सप्ताह इसी चौगान में मिंजर मेले का भव्य आयोजन किया जाता है।
वर्तमान में चम्बा चौगान को चारों तरफ लगे अनारकली के सुंदर जंगले जहां सुशोभित कर रहे हैं वहीं 133 फुट ऊंचा राष्ट्रीय ध्वज आगंतुकों को चंबा निवासियों के आपसी भाईचारे सौहार्द और राष्ट्रभक्ति की भावनाओं का सशक्त संदेश संप्रेषित करता है। सहस्राब्दि द्वार भी चौगान की सुंदरता में इज़ाफा करता है। चम्बा चौगान के प्रथम मुख्य भाग के रखरखाव के लिए इसे शीत ऋतु में बंद कर दिया जाता है । चम्बा नगर के संस्थापक राजा ” “साहिल वर्मन” की बेटी “चम्पा” की याद में आयोजित किए जाने वाले ” सूही मेला ” (11 से 13 अप्रैल) के अवसर पर इसे पुनः आमजन के लिए खो दिया जाता है। ग्रीष्म काल में स्वच्छ, शीतल हवा के लिए जुटते हजूम चौगान की उपयोगिता का सहजता से बखान कर जाते हैं।




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